शनिवार, 5 मई 2007

यादें बचपन की

उस दिन मुझे कुछ खास काम नहीं था। मैं कुछ यूं ही इधर उधर भटक रहा था और सोच रहा था की आज करना क्या है? मैं यह सोच ही रहा था कि किसी नें कहा जरा पिछे मुड के देखो। मैंने देखा मेरा बहुत पुराना दोस्त खड़ा है। उस से मुद्दतों बाद मिल रहा था। बस फिर क्या था हम लोग तुरुंत एक होटल में जगह ले कर बैठ गए और पुरानी बातें याद करने लगे। बातों ही बातों में यादों के परत खुलते गए और हम अपने बचपन में जा पहुंचे जब जीवन में सरलता थी। जब ऐसा कुछ भी नहीं था जो हमें लगता कि हम नहीं कर पायंगे. इतना कुछ जानते भी नहीं थे।। असंभव क्या संभव का अर्थ भी भली भांति मालूम नहीं था।

गाँधी मैदान से बेहतर कोई मैदान क्या होगा? बैली रोड़ से बेहतर कोई सड़क क्या होगी? गोलघर से बेहतर और कहॉ से गंगा को देखा जा सकता है? तब ना टीवी थी ना इन्टरनेट। एक रेडियो था और उस पर भी ज़्यादातर सरकारी कार्यक्रम। बस एक कार्यक्रम विविद भारती का। बच्चों के लिए कार्यक्रम होता था रविवार को - बाल मंडली। वो वक़्त था जब लाफ्टर चैलेन्ज के जैसा कार्यक्रम था लोहा सिंह जो बड़ा ही विख्यात था। खदेरन को मदर और फाटक बाबा सबसे नामी किरदार थे। और रात को हवामहल देख कर सो जाते थे।

राष्ट्रकवि दिनकर के कविताओं कि गूंज थी। दशहरे में हार्डिंग पार्क के कार्यक्रम से बेहतर कोई संगीत का क्या कार्यक्रम होगा? जब होटल जाने का मतलब डाक बंगला चौराहे पर काफ़ी हौसे में डोसा खाना था। छुट्टी का मतलब गाँव अपने दादा दादी से मिलने जाना था। यह वो समय था जब समाचार घटनाओं को जनता तक पहुचाने का काम करते थे ना कि घटना बनाने का। सभी शाम को साढ़े सात बजे आकाशवाणी से प्रादेशिक समाचार का इंतज़ार करते थे, ना कि सारा दिन उसी समाचार को दुहराते देख परेशान होते। लोग सुबह आर्यावर्त और प्रदीप पढ़ते थेअगर अंग्रेजी अखबार चाहिऐ तो सर्च लाइट और इंडियन नेशन था

जे जी कार और डी लाल के दुकान से बेहतर दुकान क्या हो सकती थी। डाक बंगला चौराहे पर के दुकान से बेहतर सोफ्टी आइसक्रीम और कहॉ? पाटलिपुत्र कालोनी से बेहतर मकान कहॉ? अशोक सिनेमा हॉल के वातानुकुलित वातावरण का विशेष महत्त्व था। और अगर विशेष खरीदारी करनी है तो अशोक राजपथ के पटना मार्केट से बेहतर बाज़ार कहाँ? हथुआ मार्केट के खिलोने वाले से बेहतर दूकानदार कहॉ? पता नहीं दिन के कितने खिलोने बेचता था पर दिखाता बहुत चाव से था। हम भी कौन सा हर बार जाते थे तो खिलोने खरीदने को मिलते थे। हाँ देखने का मज़ा जरूर लेते थे।

हम तब बालक, नन्दन और पराग पढ़ते थे। पिताजी और माताजी धर्मयुग। सडक पर गाडियां कम और साईकिल ज्यादा थे। मौर्य होटल का मतलब गाँधी मैदान के दक्षिणी कोने वाला होटल था ना कि दिल्ली के सरदार पटेल मार्ग पर का होटल। तब हम मुज़ियम को जादूघर कहते थे। शीतल जल के लिए सुराही थी, ना कि फ्रिजहर कलायी पर घड़ी तो नहीं थी, पर काम समय पर ज्यादा होता था। "सेक्रैतिअट" का घंटा जो था! ध्वनि प्रदुषण कम था और समय तत्परता अधिक

संजय गाँधी जैविक उद्यान का नाम बोटैनिकल गार्डन था। या नहीं तो चिड़िया घर। वैसे अन्दर चिड़िया कम और पेड पौधे और जानवर ज्यादा थे। मजहरूल हक पथ को फ्रेज़र रोड़ कहते थे। जैप्रकाश तब सड़क नहीं लोकनायक थे। तब पटना "साहब" नहीं" सिटी" हुआ कर्ता था। तब पोटेटो वेफर्स नहीं टन टन भाजा बिकता था। गोल्डन का मतलब आइस क्रीम् और पोल्सन का मतलब मक्खन। तब खाना गैस पर नहीं कोइला पर बनता था। घरों पर धुँआ निकलने के लिए चिमनी होती थी जो बिना बिजली के चलती थी। गोबर का गोइंथा भी इंधन के काम आता था।

और सबसे अहम बात थी कि बिहारी गाली नहीं गौरवशाली था।

8 टिप्‍पणियां:

Chandan ने कहा…

साहब,मजा आ गया आपका ये ब्लोग पध कर । सही मायने मे शायद वही वास्तविक पटना कि पहचान थी...अन्तिम दौर थी पटना के व्यक्तित्वा की.. अपनापन की। अब तो वे क्षन सदा के लिए पटना के नई परिवेश मे ओझिल हो गए..सिर्फ स्मृतियाँ ही सेष हैं । टन-टन भाजा..अरे sir,क्या याद दिलाया आपने..कल वो जहाँ भी मिलेगा..खोज के खाऊँगा :)

Ajit Chouhan ने कहा…

Excellent post tvs.Reminds us of the good old vintage days.

Samir Kumar Mishra ने कहा…

Good one TVS :) Reminds me of child hood when 3pm means Gully Cricket Time and 7pm means time to eat (lunch at times) and study.

Look forward to see many more such posts from you.

Unknown ने कहा…

simply awesome

Ranjeet Kumar ने कहा…

Really Awsome !! I got remembered Rambriksh Benipuri's "Dehati Dunia".

You made some point very strongly such as "जब समाचार घटनाओं को जनता तक पहुचाने का काम करते थे ना कि घटना बनाने का।" another one is "छुट्टी का मतलब गाँव अपने दादा दादी से मिलने जाना था।" Now family becames Husband, Wife and children. Father and Mother now called "dependent". An another strong statement "जैप्रकाश तब सड़क नहीं लोकनायक थे।"

Please keep writing such good stuff.

Ashish Mishra ने कहा…

TVS sir..
Excellant stuff, you blog scratched old memories.
Keep Writing.
Ashish Mishra

बेनामी ने कहा…

Hi,

Its really Amazing.. i wish, u ll continue this.

Sarvesh kumar

Unknown ने कहा…

kya baat hai! isse badhiya kuch kaha nahi ja sakta hai.